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Tuesday, January 17, 2023
Friday, October 13, 2017
उटपटांग फैशन
लोग ब्वना छन कि कलयुग लग्यू च
पर कुछ नौनियों थै देखी मी लगणू
अरे अभी त!
आदिम युग चलणू च।।
हाथों मा न चूड़ी,
खुट्यों मा न पैजी,
माथा फर न बिन्दी,
नाक मा न फुल्ली,
न गलोबन्द, न बुलाक,
न तिलहरी न सीसफूला
गात पर-
न धोती न पढगो,
न कुर्ता न पैजमी,
न साड़ी न सुलार।।
कै थै क्वी शर्म न लाज
उटपटांग फैशन कु हुयूॅ नंगू नाच,
अर नंगी ह्वे की
कथगा सभ्य ह्वे गे समाज।
पर यूॅ थै क्य पता
कि यूॅका बाना कथगै दरजी
भूखी म्वर्ना छन आज।।
अतुल गुसाई जाखी
Thursday, March 30, 2017
गीत -भैजी का ब्यो मा...
भैजी का ब्यो मा पौणे नाच
मिन त करण घर्या नाच
देशी भैजी तेरू देशी नाच
यख नि चलण सोच ले आज
यख नि चलण बींगी ले आज।
ढोल्या काका जरा तचो ढोल
औवजी का जरा तचो ढोल
बारह कसणी कसके दे
ढोल दमो मा नचे दे।
मसगा भैज तेरू मसकबीन
सकगा दिदा तेरू मशकबीन
बजे दे खुद लगीं, सुणे दे खुद लगीं।
बारह मैनों का बारह रीत
बजे दे माया का गीत।
भैजी का ब्यो मा ...
रंग मयळी या मेहंदी रात
मेहन्दी लगाण मिन भी हाथ
सुण रे दिदा मेरी बात
टिकुली बिन्दुली मिल मुलाण
मिन भी अफकू ब्योली खुज्याण।
भैजी का ब्यो मा ...
गेडू दाळी कू बारी भात
लरक तरक ह्वे गे गात
बामण बोडा को जसिलो हाथ
रस्याण आई पौणे भात
रस्याण आई पौणे भात
सर्वाधिकार सुरक्षित, अतुल गुसाई जाखी
औवजी का जरा तचो ढोल
बारह कसणी कसके दे
ढोल दमो मा नचे दे।
मसगा भैज तेरू मसकबीन
सकगा दिदा तेरू मशकबीन
बजे दे खुद लगीं, सुणे दे खुद लगीं।
बारह मैनों का बारह रीत
बजे दे माया का गीत।
भैजी का ब्यो मा ...
रंग मयळी या मेहंदी रात
मेहन्दी लगाण मिन भी हाथ
सुण रे दिदा मेरी बात
टिकुली बिन्दुली मिल मुलाण
मिन भी अफकू ब्योली खुज्याण।
भैजी का ब्यो मा ...
गेडू दाळी कू बारी भात
लरक तरक ह्वे गे गात
बामण बोडा को जसिलो हाथ
रस्याण आई पौणे भात
रस्याण आई पौणे भात
सर्वाधिकार सुरक्षित, अतुल गुसाई जाखी
Sunday, February 28, 2016
Tuesday, October 20, 2015
Friday, July 10, 2015
Wednesday, February 18, 2015
उत्तराखंड ग्वाया लगाणू।
मेरी
किसी राजनेता या किसी पार्टी से जाती दुश्मनी नहीं है, यह
कविता मेरा सिर्फ दर्द मात्र है इसे अन्यथा ना ले। इस से पहले भी मैंने कई
राजनीतिक व्यंग लिखे,
कई
लोगों कू बुरा लगा, कई लोगों ने डराने धमकाने की कोशिस भी की, मैं
उन भाईयों को सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की मैंने आज तक जो भी लिखा, उसे
मैंने आप ही लोगो से सुना, समाचार पत्र-पत्रीकाओ मे पढ़ा
और उन्ही बातों को सिर्फ मैंने अपने शब्दों मे बयां किया है....फिर भी किसी को
बुरा लगे तो माफी चाहता हूँ ...और लिखने के लिए मुझे कोई रोक नहीं सकता क्यूँ की
मैं भी आजाद देश का स्वतंत्र नागरिक हूँ। खैर बातें तो होती रहेंगी...हाल फिलाल
प्रस्तुत रचना उत्तराखंड ग्वाया लगाणू का आनंद ले।
उत्तराखंड
ग्वाया लगाणू।
_______________________
बोला
हर दा यू क्या च हूँणू
यू
उत्तराखंड क्यां कु रुणू ,
कैले
क्वी येका आंशू नि फुंजणु
कैले
क्वी ये नि बुथाणू ,
14
साल कु ह्वे गे उत्तराखंड
कैले
यू आज भी ग्वाया लगाणू।
कोच
येकी ब्वे, कख च येकू बुबा,
कले
च यू भूका कु चिल्लाणू,
हर
पाँच साल मा उन
द्वि-द्वी
आन्दा तुम,
फिर
कले च यू आज भी
छोरा
– छपिरा सी जिंदगी बिताणू।
कोच उ, जु
येकू आँखा घुराणू,
अनाथ
सी समझी येतै लत्याणू,
तुम
बुना की सब ठीक ठाक चलणू,
फिर
कले नीच यू अपणा,
हाथ
खुट्टा हिलाणू।
बोला
हर दा कुछ त बोला,
14
साल बाद भी कले च यू,
ग्वाया
लगाणू।।
अतुल गुसाईं (सर्वाधिकार सुरक्षित)
Friday, February 13, 2015
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